15th August 1947 Indian Independence Day

15th August 1947 Indian Independence Day - १५ अगस्त १९४७ भारत की आज़ादी का दिन



ब्रिटिश सरकार अगर १९४७ कि जगह १९२० या १९४० में आज़ादी दे देती तो भारत को १९४७ के बाद जिस दौर से गुज़रना पडा वह शायद नही होता।

हिंदुस्तान के पहले गवर्नर जनरल और ब्रिटिश भारत के आखरी वाईसरोय लॉर्ड माउंटबेटन १५ अगस्त १९४७ के दिन पहला शपथ ग्रहण था, उस दिन का कार्यक्रम की सूची के अनुसार -

सुबह ८.३० बजे गवर्नर - जनरल और मंत्रियो का गवर्न्मेंट हाउस में शपथ - ग्रहण समारोह

सुबह ९.४० बजे मंत्रियो के द्वारा संविधान सभा के लिए प्रस्थान और राजकीय यात्रा

सुबह ९.५५ बजे गवर्नर जनरल को शाही सलामी

सुबह १०.३० बजे संविधान सभा मे राष्ट्र ध्वज को फहराना और गवर्न्मेंट हाउस की तरफ राजकीय यात्रा

शाम ६.०० से ७.४५ बजे तक ईंडिया गेट पर झंडोत्तोलन, दीप प्रज्वलन, और आतशबाजी

शाम ८.४५ बजे गवर्न्मेंट हाउस में आधिकारिक भोजन

रात १०.१५ बजे गवर्न्मेंट हाउस में प्रीतिभोज

दिल्ली संविधान सभा में सभा के अध्यक्ष ने सभा की शुरूआत महात्मा गांधी को संबोधित करते हुए की तो पुरा सभा खंड तालीयों से गुंज उठा और हरतरफ गांधीजी के जय जयकार हो रही थी। सभा खंडमें सिर्फ और सिर्फ गांधी टोपी दिख रही थी। गांधीजी राजधानी में मौजुद नही थे वे कलकत्ता में थे और उन्होने वहा भी एक भी समारोह में वे मोजुद नही रहे थे। हकीकत तो यह थी के गांधीजी अंदर ही अंदर बहुत खिन्न थे। गांधीजीने १५ अगस्त १९४७ को चोबीस घंटे का उपवास करके मनाया था। उनके लिए जिस आज़ादीके लिए इतना संघर्ष किया वह आज़ादी बहुत महंगी साबित हो रही थी।

हमे आज़ादी तो मिलि थी लेकिन मुल्क के बंटवारे के साथ और अगस्त १९४७ के पहले के चार मास की बात करें तो लगागार हिंदु-मुसलमान के दंगे हो रहे थे। एसे में उन्हे सुझ नही रहा था कि जिस आज़ादी के लिए वे लडे उसका जश्न मनाना चाहिए या बटवारे का दुख मनाए। कलकत्तामें १६ अगस्त १९४६ को हिंसा शुरू हो गई थी, और दंगो की आगने पुरे बंगाल को अपने चपेटमें ले लिया था। साथ ही साथ बिहार और पंजाब में भी हिंसा भडक गई थी और पंजाब में जिस तरह से हिंसा और नरसंहार हुए थे जिसने पुराने सब दंगो के आंकडो को पीछे छोड दिया था।

गांधीजी इस हिंसा के दर्शक बने नही रहना चाहते थे। और इसी वजह से १५ अगस्त के दिन उन्होने उपवास और प्रार्थना का कार्यक्रम किया। बंटवारे से करीब करीब एक करोड लोग इधर से उधर हो गए थे। एक काफिला करीब एक लाख लोगो का था जो जलंधर से लाहोर की तरफ जा रहा था और उस काफिले को अमृतसर से होकर जाना था, और वहा पहले से ही करीब ७०००० शरणार्थी मौजुद थे और उन्होने नरसंहार का नज़ारा देखने के साथ साथ उसे भोगा था, इसी वजह से वे लोग उत्तेजित थे। अपने हवाई दौरे के दरम्यान नेहरु को जब यह बात मालुम पडी तो वे चिंतित हो गए और उन्होने दोनो शहर को जोडने वाले रास्ते को काट दिया जिससे एक और नरसंहार न हो।

महात्माने राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के एक शिबिर का दौरा किया और उन लोगो से शांति बनाये रखने की अपील की। सन १९२५ में आर.एस. एस. की स्थापना एक महारष्ट्रीयन डोक्टरने की थी, जो हिंदु जौजवानोका एक कट्टर और जुनूनी संगठन था। गांधी खुद आरएसएस के अनुशासन से प्रभावित थे लेकिन वे दूसरे धर्मो के प्रति आरएसएस की असहिष्णुता से वे इत्तेफाक नही रखते थे। उन्होने संघ के कार्यकर्ताओ को कहा कि वे संघ के अनुशासन और संगठन को महसूस कर रहे है, लेकिन उन्होने साथ साथ कार्यकर्ताओ को सतर्क भी किया कि इसकी ताकत हिंदुस्तान की भलाई के लिए हो सकती है और उसके खिलाफ भी हो सकती है। गांधी अपने समदर्शी व्यवहार से साबित करना चाहते थे कि संघ पर लगे आरोप आधारहीन है। ७ दिसम्बर १९४७ के दिन रविवार को आरएसएस ने दिल्ली के रामलीला मैदान में एक विशाल सभा का आयोजन किया और इस सभा के मुख्य वक्ता एम. एस. गोलवलकर थे। हिंदुस्तान टाईम्स की खबर के अनुसार गोलवलकरने आरएसएस एक हिंदु राष्ट्र की स्थापना करना चाहता है, इस बात का खंडन करते हुए कहा कि हम हिंदु समाज को मज़बूत बनाना चाहते है। इस आदर्श को आगे रखकर संघ अपनी राह पर चलेगा और किसी भी सत्ता या व्यक्तित्व से प्रभावित होकर अपनी राह नही बदलेगा।

संदर्भ : भारत गांधी के बाद

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