Shimla Conference - Sardar Vallabhbhai Patel

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शिमला सम्मेलन  १४ जून, १९४५ ई. को वायसराय लॉर्ड बेवेलने अपने एक ब्राडकास्ट भाषण मे राजनीतिक गतिरोध दूर करने के लिए और अंन्तरिम सरकार के गठन ...

शिमला सम्मेलन 


१४ जून, १९४५ ई. को वायसराय लॉर्ड बेवेलने अपने एक ब्राडकास्ट भाषण मे राजनीतिक गतिरोध दूर करने के लिए और अंन्तरिम सरकार के गठन के लिए शिमला मे एक सम्मेलन करने की घोषणा की। उनका प्रस्ताव था कि वायसराय की कार्यकारिणी मे "कास्ट हिंदु (स्वर्ण हिंदु) और मुसलमानो की बराबर-बराबर प्रतिनिधित्व दिया जाय।(बोम्बे कार्निकल, १८ जून १९४५ के आधार पर) तथा वायसराय के प्रधान सेनापति के अतिरिक्त शेष सभी सदस्य भारतीय थे। वैदेशिक कार्य भी भारतीयो को दे दिया जायेगा। कार्यकारिणी वर्तमान विधान के आधीन ही कार्य करती रहेगी जब तक कि नया विधान न बन जाय। वायसराय केवल वैधानिक प्रमुख बना रहेगा।


१७ जून, १९४५ को सरदार पटेलने कास्ट हिंदू शब्द पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा "यदि यह शर्त रही तो सम्मेलन मे कोंग्रेस का कोई औचित्य नही होगा क्योकि कोंग्रेस कोई वर्गीय संगठन नही है।"

वायसराय के प्रस्ताव पर विचार करने हेतु कोंग्रेस कार्यसमिति की बैठक मौलाना अब्दुल कलाम की अध्यक्षता मे बम्बई मे हुई। २१ व २२ जून को सम्पन्न इस बैठक मे निर्णय लिया कि २५ जून, १९४५ ई. को प्रस्तावित वायसराय की (शिमला) बैठक मे कोंग्रेस शामिल होगी।

२५ जून, १९४५ ई. को सम्मेलन प्रारम्भ हुआ। सम्मेलन के पहले ही दिन जिन्ना के इस वक्तव्य से सम्मेलन की सफलता संदिग्ध हो गई कि - "कोंग्रेस १० प्रतिशत हिंहुओ का प्रतिनिधित्व करती है जबकि मुस्लिम लीग ९० प्रतिशत या उससे अधिक मुसलमानो का प्रतिनिधित्व करती है।" तथा यह कहना गलत है कि कोंग्रेस का समस्त समुदायो पर प्रभाव है। (सरदार वल्लभ भाई पटेल व्यक्तित्व एवं विचार पृ. ११५ के आधार पर) २७ जून को जिन्ना ने वायसराय से स्पष्ट कह दिया कि वह केंद्रीय कार्यपालिका मे किसी अन्य दल के मुसलमान को स्वीकार नही करेंगे। अत कोंग्रेस और मुस्लिम लीग के मतभेद २९ जून को स्पष्ट हो गया।

३० जून १९४५ ई. को सरदार पटेल ने अपने भाषण मे कहा कि, "कोंग्रेस अपना राष्ट्रीय स्वरूप नष्ट नही कर सकती और न ही वह अपने सम्पूर्ण देश के प्रतिनिधित्व के दावे से पीछे हट सकती है। जिन्ना भले ही दावाअ करे कि देश के मुसलमानो का प्रतिनिधित्व मुस्लिम लीग करती है। कोंग्रेस ऐसे दावो को मानने की बजाय अलग रहना ही पसंद करेगी।" (वही पृ. ११५ के आधार पर) कोंग्रेस लीग गतिरोध के कारण २८ जून, १९४५ को १५ दिन के लिए स्थगित सम्मेलन पुन: १४ सितम्बर, १९४५ को शुरू हुआ। कोंग्रेसने अपने द्वारा दिये गये नामो मे सभी दलो के नाम दिये थे जबकि मुस्लिम लीगने कोई नाम देने से इंकार कर दिया। वायसरायने इस पर सम्मेलन को अनिश्चित काल के लिए भंग कर दिया।

Source : भारतीय राजनीति और सरदार वल्लभभाई पटेल तथा उनके विचारोंं की आधुनिक समय में प्रासंगिकता.

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